आँखों में हों आँसू और होठों पे माँ का नाम
क्यूँ नहीं रिझेगी मेरी माँ क्यों नहीं मानेगी मेरी माँ
अपने पापों पर पछता के जब भी तू रो देगा
तेरा इक इक आँसू तेरे पापों को धो देगा
माँ के दर्शन होंगें तेरी आहों का इनाम
आँसू हैं वो दर्पण जिनमे रूप मईया का बसता
रोने भर से माँ मिलें तो जानो सौदा सस्ता
कितने दुर्लभ माँ के दर्शन कितने सस्ते दाम
रोने पे ये जग हँसता है रो देना आसान नहीं
दीनबंधु माँ करुणा सिन्धु कर देगी पहचान सही
भक्तवत्सला शरणागत को भज ले सुबह शाम
वो आँसू भी क्या आसूं जो जग के लिए बहाए
माँ की याद में बहें जो आँसू वो आँसू कहलाये
तेरे ऐसे इक आँसू पे दौड़ी आएगी माँ